Khatu ShyamJi Mela

!! Shree Shyam Baba !!

बोलो जय.जय जय श्री कृष्णएबोलो जय. जय जय श्री श्याम
बोलो जय.जय जय श्री कृष्णएबोलो जय. जय जय श्री श्याम

धन्य हुई खाटू नगरीएधन्य ढूंढा का देश
प्रकट शीश बै निज मंदिरएसूना रहे आदेश
हारे को देते सहाराएपूजे सकल जहान
बना दिया कलयुग का देवएदेवी सा देव महान

बोलो जय.जय जय श्री कृष्णएबोलो जय.जय जय श्री श्याम
बोलो जय.जय जय श्री कृष्णएबोलो जय.जय जय श्री श्याम

पांडव कुल का लाल लाडलाएभीम पौत्र बलकारी
है घटोत्कच.मोर्वीनंदनएदानी लखदातारी
टीकम की साँसों की मालाएकरे श्याम गुण.गान
बना दिया कलयुग का देवएदेवी सा देव महान ण्ण्ण्
श्री कृष्ण ने बर्बरीक कोए देकर के बरदान
बना दिया कलयुग का देवएदेवी सा देव महान

बोलो जय.जय जय श्री कृष्णएबोलो जय.जय जय श्री श्याम

बोलो जय.जय जय श्री कृष्णएबोलो जय.जय जय श्री श्याम
!!जय श्री मोर्वीनंदन जय श्री खाटू श्यामजी!!

Khatushyamji: Khatushyamji Phalgun Mela

Khatushyamji temple Phalguna Festival Mela is the most famous mela of Shree Shyam Ji, which is usually Celebrated for five days , in the month of Phalguna according to hindi punchang close to Holi Festival.

खाटू श्यामजी। बाबा श्याम का फाल्गुनी लक्खी मेला 15 से 20 मार्च तक आयोजित होगा। मेले की तैयारियां तेजी से चल रही हैं। श्री श्याम मंदिर कमेटी कई दिनों से भक्तों की हर सुविधा को ध्यान में रखते हुए तैयारी में जुटी हुई है।

Khatushyamji History In Hindi:वीर बर्बरीक कैसे बने बाबा श्याम

महाभारत का युद्ध भारत के इतिहास की बड़ी घटना है। इसी युद्ध ने कई शूरवीरों को असमय ही यमलोक भेज दिया तो यही युद्ध गीता के उद्भव का कारण बना। साथ ही एक वीर का श्याम रूप में उदय होना भी महाभारत की देन है। जब महाभारत का युद्ध होना निश्चित हो चुका था तब बर्बरीक की मुलाकात कृष्ण से हुई।

Khatushyamji Story In Hindi:ऐसे करें शिवजी का अभिषेक, ग्रह दोष नहीं कर पाएगा बाल भी बांका

बर्बरीक भीम का पोता एवं घटोत्कच का पुत्र था। वह युद्ध में भाग लेना चाहता था। उसने नौ दुर्गाओं की तपस्या की थी और उसके पास तपस्या से अर्जित तीन दिव्य बाण थे। इनसे वह सभी योद्धाओं का संहार कर सकता था। कृष्ण ने दूरदर्शिता से यह अनुमान लगा लिया कि इस वीर के युद्ध में शामिल होने से भयंकर विनाश होगा। साथ ही पांडवों की विजय भी संकट में पड़ जाएगी, क्योंकि बर्बरीक ने प्रतिज्ञा की थी कि वह उसी पक्ष की ओर से युद्ध करेगा, जो कमजोर होगा।

कमजोर को विजयी बनाना उसका लक्ष्य होगा, ताकि निर्बल के साथ अन्याय न हो। श्रीकृष्ण सत्य की रक्षा के लिए पांडवों की विजय चाहते थे। वे जानते थे कि कौरवों की हार होगी। इस स्थिति में अगर बर्बरीक युद्ध में शामिल होता तो वह उनका पक्ष ले सकता था। इससे पांडवों की विजय संदिग्ध थी।

बर्बरीक सिर्फ महान योद्धा ही नहीं था। वह उच्च कोटि का दानवीर था। अपने द्वार पर आए याचक को कभी खाली हाथ नहीं जाने देता। तब कृष्ण ने ब्राह्मण का वेश बनाया और उससे तीन बाणों का रहस्य पूछा। बर्बरीक ने कहा, मैं इन तीनों बाणों से समूची सेना को मृत्यु के मुख में पहुंचा सकता हूं। कृष्ण ने उसे यह सिद्ध करने के लिए कहा।

बर्बरीक उन्हें पीपल के एक वृक्ष के पास ले गया। वहां कृष्ण ने वृक्ष का एक पत्ता तोड़कर अपने पैर तले छुपा लिया। बर्बरीक ने तीर चलाया और वृक्ष के सभी पत्ते चिह्नित हो गए। उसने दूसरा तीर चलाया तो सभी पत्ते तीर से बिंध गए। जो पत्ता कृष्ण के पैर तले था, तीर उसे भी बींधने चला गया।

उनके पैर हटाने के बाद तीर ने पत्ते को बींध दिया। इस घटना से कृष्ण चिंतित हो गए, क्योंकि इतनी शक्तियों का स्वामी बर्बरीक बहुत शीघ्र युद्ध का अंत कर सकता था और सभी योद्धाओं को मृत्यु की गोद में पहुंचा सकता था।

कृष्ण अपने वास्तविक स्वरूप में आए और बर्बरीक से दान में उसका शीश मांग लिया। बर्बरीक ने बेहिचक उनकी बात मान ली, परंतु एक इच्छा भी जताई। वह कृष्ण के दिव्य स्वरूप के दर्शन करना चाहता था। भगवान ने यह इच्छा पूरी की।

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